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अन्तर्जातीय विवाह पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

अन्तर्जातीय विवाह पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
Written by priyanshu singh

प्रस्तावना – ‘अन्तर्जातीय विवाह‘ अर्थात् दूसरी जाति में विवाह । प्राचीन भारत में अन्तर्जातीय विवाह की परम्परा एक स्वस्थ परम्परा समझी जाती थी। ‘स्वयंवर’ भी इसी परम्परा का एक अंग था परन्तु उस काल में इसके प्रतिवाद भी उपलब्ध थे, जैसे द्रोपदी स्वयंवर में कर्ण को हिस्सा लेने की अनुमति नहीं मिल पाई थी क्योंकि वह ‘सूत-पुत्र’ था। अर्जुन, कृष्ण, भीम आदि ने अन्तर्जातीय विवाह करके आदर्श उपस्थित किए थे। इसके पश्चात् मध्यकालीन भारत में भी अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन था किन्तु उस समय ऐसे विवाहों को तिरस्कार तथा अनादर की दृष्टि से देखा जाता था। ऐसे पति-पत्नी समाज में सम्मान के स्थान पर तिरस्कार तथा घृणा के पात्र बनते थे।

आधुनिक समय में अन्तर्जातीय विशह

आज के समय में अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन जोरों पर है। बड़े-बड़े नगरों एवं महानगरों में तो ऐसे विवाह आम बात हो चुके हैं। आज लड़के-लड़की एक साथ पढ़ते हैं, ऑफिस में काम करते हैं, साथ घूमने जाते हैं और इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते कि उनके साथी की जाति क्या है। ये तो बस प्यार के साथ अपना घर बसाना चाहते हैं ऐसे में उनके माता-पिता को कभी खुशी से तो कभी मजबूरी में उनके रिश्ते को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है। यदि कोई माँ-बाप ऐसे रिश्ते स्वीकार नहीं करते, तो कभी कभी लड़के-लड़कियाँ गलत कदम भी उठा लेते हैं। ये या तो अपने माँ-बाप की मर्जी के विरुद्ध विवाह कर लेते हैं या फिर कभी-कभी निराशा में अपनी जान भी गँवा बैठते हैं।

अन्तर्जातीय विवाह का महत्व

अन्तर्जातीय विवाहों का राष्ट्रीय जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनसे राष्ट्रीय एकता व अखण्डता की भावना प्रबल होती है। इससे दहेज समस्या का भी हल निकल जाता है क्योंकि ऐसे विवाहों में लड़के वाले कोई दहेज नहीं माँगते, जो कुछ लड़की वाले देते हैं यह अपनी सामर्थ्य तथा इच्छा के अनुसार देते हैं अन्तर्जातीय विवाह का एक लाभ यह भी होता है कि इससे दूसरी जाति के रीति-रिवाजों, वेश-भूषा, भोजन, रहन-सहन के बारे में जानने का अवसर मिल जाता है। इससे संस्कृति का आदान-प्रदान भी होता है अर्थात् अनेकता में एकता की भावना सुदृढ़ होती है।

अन्तर्जातीय विवाह को सफल बनाने के उपाय

अन्तर्जातीय विवाह ऊपर से देखने पर तो बहुत अच्छे लगते हैं परन्तु ऐसे रिश्तों को निभाने के लिए बहुत सवधानी की आवश्यकता होती है। पति-पत्नी दोनों को ही एक दूसरे के धर्म का पूर्ण आदर-सम्मान करना चाहिए। एक को दूसरे को कोई भी रीति-रिवाज मानने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। यदि पति-पत्नी दोनों ही संयम में रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगें तो उनके वैवाहिक सम्बन्धों में कभी भी कटुता पैदा नहीं होगी एवं दोनों पक्ष स्वतन्त्र जीवनयापन की ओर अग्रसर होंगे। इस सम्बन्ध में समाज का विरोध भी वे डटकर झेल लेंगे। यदि सरकार की ओर से ऐसे विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए तो प्रत्येक युवक-युवती संकीर्ण मनोवृत्तियों को त्याग कर समाज के तथाकथित धर्म के ठेकेदारों की चुनौतियों को स्वीकार कर सकेंगें तथा अन्तर्जातीय विवाह सफल सिद्ध हो सकते हैं।

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अनेक सामाजिक बाधाओं का सामना करने के साथ-साथ इस प्रकार के विवाह बन्धनों में बँधे नव-दम्पत्ति को भावुकता त्याग कर अपने जीवन की वास्तविकता को सहज स्वीकार कर अपने घर का वातावरण सुखद बनाने की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव से ही वे आपसी सूझ-बूझ पैदाकर अपने गृहस्थ जीवन को सफल बना सकते हैं।

उपसंहार – विचारों में इतना खुलापन होने के बावजूद भी आज गाँवों में स्थिति बहुत दयनीय है। ऐसे विवाहों के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है। इनका मूल कारण है वर्ण व्यवस्था जन्यत्रुटियों, जिनके कारण हमारा ग्राम्य जीवन बहुत विषाक्त एवं असामाजिक बनता जा रहा है।

अन्तर्जातीय विवाह और भी अधिक कामयाब तभी हो सकते हैं जब लोगों का नजरिया ऐसे विवाहों के प्रति संकीर्ण न हों। हर व्यक्ति को विजातीय एवं अन्तर्जातीय विवाहों के प्रति उदासीनता का उपेक्षापूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए, अपितु दोनों ही प्रकार के विवाह को पूरा सम्मान व प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

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