Sociology

अवलोकन की परिभाषा दीजिए। अवलोकन की विशेषताओं एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।

अवलोकन की परिभाषा दीजिए। अवलोकन की विशेषताओं एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Written by priyanshu singh

अवलोकन की परिभाषा – एक अनुसंधानकर्ता जब तक स्वयं किसी तथ्य का निरीक्षण नहीं कर लेता है तब L तक उसे स्वीकार नहीं करेगा। वह स्वयं निरीक्षण द्वारा सन्देह को दूर कर सत्य के पास पहुँचने की कोशिश है। निरीक्षण पद्धति का प्रयोग समाज वैज्ञानिकों द्वारा वर्ग, समुदाय, स्त्री- पुरुष, संस्थाओं के अध्ययन के लिए किया जा रहा है। आज सामाजिक अनुसंधान में अवलोकन विधि का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

निरीक्षण अंग्रेजी के (Observation) का पर्यायवाची है जिसका अर्थ है अवलोकन करना। कार्य-कारण, पारस्परिक सम्बन्धों को जानने के लिए घटनाओं को ठीक उसी रूप से देखना और उनका आलेखन करना अवलोकन कहलाता है।

मोजर “ठोस अर्थ में अवलोकन का अर्थ कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग है।”

लेविस “अवलोकन को स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक अन्वेषण की एक शास्त्रीय विधि कह सकते हैं।”

यंग “अवलोकन आँखों द्वारा विचारपूर्वक अध्ययन की प्रणाली के रूप में काम में लाया जाता है जिससे की सामूहिक व्यवहार और जटिल सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ सम्पूर्णता की रचना करने वाली पृथक् इकाइयों का अध्ययन किया जा सके।”

अवलोकन की विशेषताएँ

(1) सूक्ष्म अध्ययन करना

अवलोकन में मात्र केवल देखना ही नहीं वरन् घटना का सूक्ष्म अध्ययन करना है। सूक्ष्म अध्ययन से उद्देश्य प्राप्ति में सफलता मिलती है।

(2) मानव इन्द्रियों का प्रयोग

अवलोकन में आँख, कान व वाणी का प्रयोग किया जा सकता है परन्तु नेत्रों के प्रयोग पर बल दिया जाता है।

(3) प्राथमिक सामग्री को प्राप्त करना

अवलोकन की मुख्य विशेषता यह है कि घटना स्थल पर जाकर वस्तुस्थिति को देख प्राथमिक सामग्री का संकलन करना है।

(4) कारण और परिणाम के सम्बन्ध का पता लगाना

वैज्ञानिक अर्थ में इसका उद्देश्य कारण परिणाम के सम्बन्ध का पता लगाना है निरीक्षणकर्त्ता स्वयं घटना को देखकर आवश्यक कारणों तथा परिणामों के सम्बन्ध स्थापित करता है।

(5) निष्पक्षता

अध्ययनकर्ता स्वयं अपनी आँखों से घटना का निरीक्षण करता है व भलीभांति जाँच करता है अतः उसका निर्णय दूसरे के कहने-सुनने पर आधारित नहीं है। स्वयं का सूक्ष्म व गहन अध्ययन उसे अभिमति (Bias) से बचाता है।

(6) अनुभवाश्रित अध्ययन

अवलोकन कल्पना पर आधारित न होकर अनुभव पर आधारित होता है।

अवलोकन विधि के प्रकार

(1) असहभागी अवलोकन

इसके अन्तर्गत अवलोकनकर्ता समुदाय की क्रियाओं का दूर से अवलोकन करके गहराई तक पहुँचने की कोशिश करता है। इस पद्धति में निरीक्षणकर्त्ता स्वतन्त्र और निष्पक्ष अवलोकन तटस्थ रूप में करता है।

(2)सहभागी अवलोकन

इसमें अवलोकनकर्ता समूह का अंग बन जाता है। वह समूह की समस्त क्रियाओं में सक्रिय सदस्य के रूप में भाग लेता है। इस प्रकार अवलोकन द्वारा उनकी आदतों व रीति रिवाजों का निष्पक्ष संकलन करता है।

(3) अर्द्ध-सहभागी अवलोकन

अर्द्ध सहभागी अवलोकन पूर्व वर्णित अवलोकन का मध्य मार्ग है। इसके अन्तर्गत अवलोकनकर्ता कुछ साधारण कार्यों में भाग लेता है और बाकी में एक तटस्थ दृष्टा के रूप में निरीक्षण करता है।

(4) अनियन्त्रित अवलोकन

इसके अन्तर्गत घटना तथा निरीक्षणकर्ता पर किसी का नियन्त्रण नहीं रहता। प्रारम्भ में इसी प्रणाली को उपयोग में लाया जाता था और उसी के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते थे। सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति भी कुछ इस तरह की होती है कि सदैव नियन्त्रित अवलोकन संभव नहीं हो सकता। घटनास्थल पर ही जाकर सामाजिक घटनाओं का सामान्यतः अध्ययन किया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से इसका मुख्य दोष यह है कि अनियन्त्रित परीक्षण भावनाओं की पर आधारित है जो किन्हीं सत्य या ठोस निष्कर्षों पर पहुँचने में बाधा पहुँचाती है। इस प्रकार के निरीक्षण में अभिमति या पक्षपात प्रवेश कर जाता है। प्रो० वनांड के शब्दों में “आंकड़े इतने वास्तविक एवं सजीव होते हैं और उनके बारे में हमारी भावनाएँ इतनी दृढ़ होती हैं कि कभी-कभी उनके ही विस्तार के लिए अपने भावों की पुष्टि से गलती करने लगते हैं। अनियन्त्रित अवलोकन का उस वक्त प्रयोग किया जाता है जब सामाजिक घटना की प्रकृति बड़ी जटिल होती है।”

(5) नियन्त्रित अवलोकन

इस प्रकार के अवलोकन में न केवल निरीक्षणकर्त्ता पर नियन्त्रण होता है बल्कि सामाजिक घटनाओं एवं कार्यक्रमों पर भी नियन्त्रण स्थापित किया जाता है। अवलोकन की सम्पूर्ण योजना पहले से ही तैयार कर ली जाती है बाद में निरीक्षण द्वा सूचनाओं को एकत्रित कर लिया जाता है। नियन्त्रण को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(अ) सामाजिक घटना पर नियन्त्रण

अधिकांश सामाजिक घटनाओं में प्रायोगिक विधि उपयुक्त नहीं होती अतः इस प्रकार का नियन्त्रण पाना काफी कठिन कार्य है। इसके अन्तर्गत सफल प्रयोग केवल बालकों पर ही हो सकते हैं। इसके सफल प्रयोग के लिए अनुसंधानकर्ता को सूझ-बूझ एवं कुशलता से कार्य करना पड़ता है।

(ब) अवलोकनकर्त्ता पर नियन्त्रण

वैसे सामाजिक घटनाओं पर नियन्त्रण रखना कठिन कार्य है, अवलोकनकर्ता स्वयं पर नियन्त्रण रख सकता है। अवलोकनकर्ता यदि पक्षपातपूर्ण व व्यक्तिगत दोषों से बचना चाहता है तो उसे स्वयं को नियन्त्रण में रखना होगा। वह नियन्त्रण कुछ साधनों के प्रयोगों से हो सकता है। अवलोकन की भली-भाँति योजना तैयार करके वह कैमरा, टेपरिकार्डर, लाटरी, पैमानों आदि को प्रयोग में ला सकता है। इससे परिणामों में निष्पक्षता एवं सत्यता अधिक होगी।

(6) सामूहिक अवलोकन

यदि किसी एक ही सामाजिक घटना का विभिन्न अनुसंधानकर्ताओं द्वारा निरन्तर अलग-अलग अवलोकन किया जाता है तो उसे सामूहिक अवलोकन कहते हैं। इस प्रकार के अवलोकन का यह लाभ है कि पुनरावृत्ति एवं कई व्यक्तियों के अध्ययन से पक्षपात की सम्भावना कम रहती है या उसे आसानी से दूर किया जा सकता है। इसका प्रयोग वे ही कर सकते हैं जो अधिक समय, सामग्री और पैसा काम में ला सकते हैं।

अवलोकन के गुण

(1) सत्यापनशीलता

शोधकर्त्ता एक सामाजिक घटना का कई बार निरीक्षण करके

(2) वैषयिकता

शोधकर्ता जो देखता है जैसा देखता है उसका ही वह विवरण प्रस्तुत घटना की सत्यता परख सकता है। करता है। अतः तथ्य सामग्री में पक्षपात नहीं होता है।

जनजातीय परिवार से आप क्या समझते हैं? इन परिवारों की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

(3) सरलता

अवलोकन विधि सबसे सरल मानी जाती है। अनुसंधानकर्त्ता की भी दिलचस्पी होती है कि यह घटनाओं का अवलोकन कर निष्पक्ष एवं उपयोगी सामग्री प्राप्त करे।

(4) विश्वसनीयता

इस पद्धति द्वारा प्राप्त तथ्यों पर विश्वास किया जा सकता है। अवलोकन • पद्धति में शोधकर्ता स्वयं सब कुछ देखता है अतः गलतियों की कम ही संभावना रहती है।

अवलोकन प्रविधि की सीमाएँ-

पी०वी० यंग के अनुसार, “समस्त घटनाएँ निरीक्षण का अवसर नहीं देती जो घटनाएँ निरीक्षण का अवसर देती हैं उनमें अवलोकनकर्ता पास में नहीं होता एवं समस्त घटनाओं का अवलोकन पद्धतियों द्वारा अध्ययन सम्भव नहीं होता है।

अवलोकन द्वारा जो तथ्य सामग्री एकत्रित की जाती है उसके निम्नलिखित दोष या (1) अवलोकनकर्ता का पक्षपात, (2) सीमित क्षेत्र, (3) विशिष्ट घटनाओं में अनुपयुक्त इत्यादि।

About the author

priyanshu singh

Leave a Comment