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मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचार का वर्णन कीजिये।

मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचार का वर्णन कीजिये।
Written by priyanshu singh

मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचार – कार्ल मार्क्स राज्य को एक नैसर्गिक संस्था न मानते हुये उसके बारे में एक विशेष प्रकार की व्याख्या की है। मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था में राज्य पर पूँजीपति वर्ग का आधिपत्य रहता है तथा वह इस सत्ता के माध्यम से स्वयं के हितों का संरक्षण करते हैं। मार्क्स ने राज्य की परिभाषा करते हुए लिखा है, “राज्य एक ऐसी चीज है जिसके माध्यम से प्रशासक वर्ग की इच्छा बाकी के वर्गों पर लादी जाती है।” मार्क्स का मत है कि आदिम समाज में राज्य नहीं या किन्तु जब वर्गों की उत्पत्ति के कारण आपस में संघर्ष की वृद्धि हुई तब विशेषाधिकारी वर्ग को अपने हितों की रक्षा हेतु सशक्त बल की आवश्यकता महसूस हुई जिसके परिणामस्वरूप राज्य की उत्पत्ति हुई। कहने के लिए राज्य जनता की शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया किन्तु राज्य पर सदैव नियन्त्रण शोषक वर्ग का ही रहा।

राज्य ने सदैव परम्परावादी व्यवस्था को कायम रखने का प्रयास किया है। यद्यपि राज्य के विषय में यह विचार सदैव रहा कि राज्य अपने कार्य निष्पक्ष रूप से रहकर करेगी। वह समाज में शान्ति व्यवस्था बनाए रखने तथा कानून और व्यवस्था की स्थिति कायम रखने के लिए कार्यरत रहेगी। किन्तु मार्क्स का मत है कि राज्य कानून व्यवस्था कायम रखने के बहाने परम्परागत हितों की रक्षा करता है। प्रशासन वर्ग का साथ देने के कारण। राज्य प्रक्रियावादी शक्ति रहा है। राज्य की सेना और पुलिस सदैव को रोकने का प्रयास करती हैं। क्रान्ति के समय सेना ने सदैव प्रतिक्रियावादी शक्ति का पक्ष लेकर समाज की नई शक्ति को कुचलने का कार्य किया है। राज्यं ने जनता का प्रतिनिधित्व न करके सामन्तवादी तथा पूँजीपतियों के हित में कार्य किया है। इसी लिये समय समय पर जनता ने राज्य के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रयोग किया है। इग्लैण्ड में क्रामवेल के नेतृत्व में शाही सेना के विरुद्ध जनता को अपनी सेना का गठन करना पड़ा था। सन् 1939 के आन्दोलन में फ्रैंकों ने सेना के बल पर स्पेन की संसदीय सरकर पर अधिकार किया था। वर्तमान समय में बिहार में नक्सलवादी सेना भी इसी का उदाहरण है।

मार्क्स का मत है कि राज्य का स्वरूप समाज के स्वरूप के साथ-साथ परिवर्तित होता रहता है और यह शोषक वर्ग के हितों के अनुरूप अपना स्वरूप बदलता है। जैसे-जैसे उत्पादन की परिस्थिति बदलती जाती है वैसे-वैसे राज्य नए शोषक वर्ग की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता जाता है। इसलिए राज्य नई परिस्थितियों के अनुरूप अपने स्वरूप को बदलता रहता है ताकि वह शोषण वर्ग के अनुकूल बना रहे तथा शोषक वर्ग उसके माध्यम से शोषण करता रहे। उदाहरणार्थ पूँजीवादी व्यवस्था में सामन्तवादी राज्य व्यवस्था बुर्जुआ वर्ग के अनुरूप नहीं थी क्योंकि सामन्तवादी समाज का आधार उच्च एवं निम्न की व्यवस्था के अनुरूप श्रम और अधिकार का बंटवारा करना था सामन्तवादी राज्य इस स्थिति को कायम रखने का यन्त्र था। पूँजीवादी व्यवस्था का आधार समझौता था।

इसलिए पूँजीवादी व्यवस्था में सामन्तवादी राज्य नये शोषकों के अनुरूप नहीं था अतः राज्य के तन्त्र को ही बदल देना पड़ा। पूँजीवादी व्यवस्था में सामन्तवादी राज्य व्यवस्था के स्थान पर प्रजातन्त्र की स्थापना हुई। इन तथाकथित प्रजातन्त्रों से पूँजीपतियों का प्रतिनिधित्वपूर्ण हो गया। पहले पूँजीपति संस्तरण व्यवस्था में तृतीय स्थान पर थे। किन्तु प्रजातन्त्र के माध्यम से उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हो गया वह बहुमत में हो गए यहीं वह चाहते थे। मार्क्स के अनुसार यह सही लोकतन्त्र नहीं है बल्कि यह बुर्जुआ का प्रतिनिधित्व करने वाला लोकतन्त्र है। पूँजीपति जनता के नाम पर अपना शासन चलाते हैं और उन कारणों का निर्माण करते हैं जो उनके औद्योगिक विशेषाधिकार की रक्षा कर सकें। बुर्जुआ शासन-श्रमिक के शोषण करने तथा व्यापारी वर्मा र्क्स लोकतन्त्र के विरोधी नहीं थे किन्तु पश्चिमी लोकतन्त्र का मजाक उड़ाते हुए उनका कहना था कि पश्चिमी लोकतन्त्र की जनता को 5 वर्ष बाद मत देने का अधिकार केवल इस बात के लिए है कि अगला कौन सा बुर्जआ दल उनका शोषण करेगा। मार्क्स का मत है कि पूँजीवादी लोकतन्त्र में बुर्जुआ वर्ग के लोग जनता के शासन के नाम पर उनका शोषण करते हैं। वे अपने स्थायी प्रवृति से जनता के समर्थन का स्वांग करने में उसका औचित्य सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार मार्क्स के अनुसार राज्य सदा प्रभावशाली वर्ग के अधीन रहता है।

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सर्वहारा क्रान्ति के बाद राज्य के लक्षण

मार्क्स का मत है कि सर्वहारा क्रान्ति के बाद भविष्य में राज्य नहीं होगा। एक वर्ग विहीन एवं राज्य विहीन समाज की स्थापना होगी। राज्य को समाप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी। वह अपने आप समाप्त हो जाएगा। राज्य का समाप्त होना होगा क्योंकि जब समाज में दो वर्ग ही नहीं रहेंगे तो उसका कार्य ही कुछ नहीं रहेगा। राज्य के समाप्त हो जाने के बाद सार्वजनिक कार्यों का राजनैतिक स्वरूप खत्म हो जायेगा। इस प्रकार की व्यवस्था में उत्पादन का लक्ष्य किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाना न होकर सामूहिक होगा। इस प्रकार की व्यवस्था में समाज में शोषक वर्ग हो जाएगा। हर एक व्यक्ति श्रमिक होगा तथा वह अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करेगा और उत्पादन पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व होगा इसलिये उत्पादन सभी व्यक्तियों की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से किया जायेगा।

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