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‘पब्लिक स्कूल’ पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

‘पब्लिक स्कूल'पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
Written by priyanshu singh

प्रस्तावना – पब्लिक स्कूल’ अथवा ‘निजी स्कूल’ आज एक प्रगतिशील उद्योग के रूप में विकसित हो रहा है। आज प्रत्येक छोटे-बड़े शहर में पब्लिक स्कूल चल रहे हैं। यहाँ तक कि गाँवों में भी छोटे-छोटे निजी स्कूलों को पब्लिक स्कूल नाम दे दिया जाता है। पब्लिक स्कूलों की स्थापना के कारण हमारे देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से ही शिक्षा के स्तर को ऊँचा करने के प्रयास सरकार की ओर से किए जा रहे हैं जिससे देश की सारी जनता की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इसी कारण प्रारम्भिक एवं माध्यमिक शिक्षा को निजी क्षेत्र लिए खोला गया तथा इसी सरकार स्कूल खोलने की अनुमति दे दी। आज पूरे देश में अनगिनत पब्लिक स्कूल, जो ‘सी.बी.एस.ई.’ तथा ‘आई.सी.एस.सी.’ द्वारा चालित है, चल रहे हैं जिनमें लाखों छात्र-छात्राएँ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सरकार की ओर से इन स्कूलों को खोलने के लिए विशेष रियायतें भी दी गई हैं, ताकि इन स्कूलों के माध्यम से जनता की शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।

सरकार (चाहे वह राज्य सरकार हो, स्थानीय सरकार हो या फिर भारत सरकार) स्कूल खोलने के लिए सस्ते दामों पर जमीनें प्रदान करती हैं जैसे यदि जमीन की वास्तविक कीमत 500 रुपए प्रति मीटर है तथा वह जगह स्कूल के लिए आरक्षित है तो उसकी कीमत मात्र 200 रु. प्रति मीटर होगी। इसके अतिरिक्त और भी कई छूटे दी जाती हैं। उन्हें सस्ते दामों में बिजली, पानी इत्यादि उपलब्ध कराएँ जाते हैं। बैंक भी स्कूलों को सस्ते दामों पर पैसा उधार दे देते हैं, ताकि वे स्कूल के लिए भवन निर्माण करा सकें।

सरकारी स्कूलों की बेकार शिक्षा प्रणाली

सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद सरकारी स्कूल श्रेष्ठ शिक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। आज सरकारी प्राइमरी विद्यालयों में सरकार की ओर से निःशुल्क शिक्षा, भोजन, वर्दी, किताबें इत्यादि उपलब्ध कराएं जाते हैं, फिर भी आज निम्नवर्गीय माता-पिता भी अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेजना चाहते। सरकारी स्कूलों में मोटा वेतन पाकर भी अध्यापक-अध्यापिकाएँ रुचिपूर्वक नहीं पढ़ाते ये सोचते हैं कि एक बार सरकारी नौकरी मिल गई है तो आराम से बैठकर खाओ। यदि कोई जागरुक व्यक्ति इन विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था अपनी आँखों से देख ले तो दंग ही रह जाए। शिक्षक आपस में बाहर बैठकर बातें करते रहते हैं, खाते-पीते रहते हैं तथा बच्चे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। तभी तो सरकारी स्कूलों में बच्चों में ये नियम-कानून नहीं होते जो निजी स्कूलों के बच्चों में होते हैं क्योंकि स्कूलों में उनके विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यही सब कारण आधुनिक माता-पिता को सरकारी स्कूलों से विमुख कर रहे हैं।

पब्लिक स्कूलों की उच्च शिक्षा प्रणाली

आज हर माँ-बाप अपने बच्चे को निजी स्कूल में ही पढ़ाना चाहता है चाहे वह उसकी क्षमता में हो या न हो। पब्लिक स्कूल माँ-बाप से मोटी फीस तो वसूलते हैं साथ ही शिक्षा भी अच्छी देते हैं। तभी तो माता-पिता बच्चे का बेहतर भविष्य बनाने के लिए निजी स्कूलों की ओर भागते हैं। जहाँ सरकारी स्कूलों में ज्यादा वेतन पाने के बावजूद शिक्षक बच्चों को शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं बल्कि बोझ समझते हैं, वही पब्लिक स्कूलों में शिक्षक कम वेतन पाकर भी पूरी लगन से पढ़ाते हैं। उनके ऊपर प्रधानाचार्य का नियन्त्रण होता है कि विद्यालय का परिणाम सौ प्रतिशत होना चाहिए। पब्लिक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के साथ सभी प्रकार की कलात्मक, शारीरिक, नैतिक तथा मानसिक शिक्षा भी दी जाती है। सभी पब्लिक स्कूलों में आज सभी प्रकार के खेलों की है। योग तथा व्यायाम की शिक्षा दी जाती है तथा अंग्रेजी बोलने पर जोर दिया जाता है। इन सभी शिक्षाओं के कारण बच्चों को सर्वांगीण विकास हो पाता है तथा इसी कारण पब्लिक स्कूलों के प्रति सभी का आकर्षण बढ़ रहा है। दिल्ली पब्लिक स्कूल (D.P.S. society) एवं D.A.V. देश में पब्लिक स्कूलों की सबसे बड़ी श्रृंखला है जिसके विद्यालय लगभग हर शहर में फैले हुए हैं।

पब्लिक स्कूलों का दूसरा पक्ष

निःसन्देह आज पब्लिक स्कूलों में शिक्षा का स्तर काफी ऊँचा हो गया है किन्तु आज इन पब्लिक स्कूलों की फीस इतनी अधिक हो गई है कि एक आम आदमी स्वयं को बोझ तले दबा हुआ महसूस करता है। स्कूल प्रबन्धन शिक्षा शुल्क के अतिरिक्त पुस्तकालय शुल्क, स्पोर्टस शुल्क, कम्प्यूटर शुल्क तथा और भी न जाने कितने शुल्क वसूलते हैं अब बच्चों के माता-पिता की मजबूरी हो गई है कि बच्चों को पढ़ाना है तो पैसा भी देना ही पड़ेगा। दूसरी ओर इन स्कूलों में आधुनिकता पर अधिक जोर दिया जाता है। फटाफट अंग्रेजी बोलने वाला बच्चा स्वयं को गर्वित महसूस करता है, साथ ही माँ-बाप भी चाहते हैं कि उनका बच्चा केवल में ही बात करे। इससे हमारी मातृ-भाषा ‘हिन्दी’ का अपमान हो रहा है साथ ही बच्चे अपनी संस्कृति तथा सभ्यता को भूलते जा रहे हैं।

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उपसंहार – आज हर वर्ष जब भी नया सत्र प्रारम्भ होता है, कितने ही नए पब्लिक स्कूल खुल जाते हैं। कारण एकदम साफ है कि इन निजी स्कूलों ने लोगों को अपने आकर्षण में फँसा लिया है। परन्तु यह कहना भी गलत .. न होगा कि शिक्षा का उच्च स्तर ही आज बच्चों को इन स्कूलों की ओर आकर्षित कर रहा है। आज का बच्चा ही कल का भावी नागरिक है। आज वह जितनी अच्छी शिक्षा प्राप्त करेगा, कल उतनी ही आसानी से अपनी आजीविका कमा सकेगा। यही सब सोचकर माँ-बाप अपनी जेब से मोटा पैसा खर्च कर बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाते हैं। इन पब्लिक स्कूलों की सफलता का यही कारण है।

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