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फ्रांस के राष्ट्रीय सभा एवं सीनेट के सभापति पर प्रकाश डालिए।

फ्रांस के राष्ट्रीय सभा एवं सीनेट के सभापति पर प्रकाश डालिए।
Written by priyanshu singh

फ्रांस के राष्ट्रीय सभा – फ्रांस की राष्ट्रीय सभा का एक सभापति होता है। राष्ट्रीय सभा का सभापति उसके प्रथम सत्र की प्रथम बैठक में संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार निर्वाचित किया जाता है। निर्वाचन गुप्त मतदान प्रणाली द्वारा होता है। प्रथम और द्वितीय मतदान सदन में कुछ सदस्यों का पूर्ण बहुमत आवश्यक है। तीसरे मतदान में केवल सामान्य बहुमत ही पर्याप्त होता है।

राष्ट्रीय सभा के सभापति की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सभापति के प्रमुख कार्य-

  1. सदन के नियमों का परिपालन,
  2. सदस्यों को बुलाने की अनुमति देना,
  3. मतदान कराना,
  4. सदन की शान्ति और व्यवस्था और अनुशासन आदि है।

सभापति के परामर्शदात्री कार्यों में संकटकाल की घोषणा करने से पूर्व और राष्ट्रीय सभा के विघटन से पूर्व राष्ट्रपति से परामर्श करना है।

राष्ट्रीय सभा के सभापति के कार्यों और उसकी स्थिति के अनुसार उसे अमेरिका की प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष से काफी निकट रखा जा सकता है, क्योंकि फ्रांस की राष्ट्रीय सभा का सभापति अपने निर्वाचन के बाद दल से अपने को अलग नहीं करता, बल्कि दल से सम्बन्ध बनाये रखता है।

सदन के अन्दर तथा बाहर राजनीति में सक्रिय भाग लेता है, पंचम गणतंत्र में मंत्रिगण संसद के सदस्य नहीं होते हैं। उसकी पूर्ति सदन के सभापति द्वारा की जाती है।

राष्ट्रीय सभा का सभापति, ब्रिटिश लोक सदन के अध्यक्ष से दो प्रकार की समानताएं रखता है। ब्रिटेन में जिस प्रकार अध्यक्ष चुने जाने के बाद सदैव के लिए अध्यक्ष की परम्परा है। इस परम्परा का पालन फ्रांस में भी किया जाता है। यदि सभापति के लिए कोई योग्य व्यक्ति चुन जाता है तो उस पद पर उसका बार-बार निर्वाचन हो सकता है। फ्रांस में यह अच्छी परम्परा है। कि योग्य व्यक्ति को चुनने वाला सदन यदि विघटित भी हो जाता है तो नया सदन भी योग्य सभापति को दुबारा निर्वाचित कर लेता है। दूसरी समानता यह है कि दलीय होते हुए भी राष्ट्रीय सभा का सभापति अपने कार्यों के सम्पादन में निष्पक्ष रूप से कार्य करता है।

सीनेट का सभापति

सीनेट का सर्वोच्च पदाधिकारी सदन का सभापति होता है। सीनेट के सभापति का निर्वाचन प्रत्येक 3 वर्ष बाद संविधान के अनुच्छेद दो के अन्तर्गत होता है। सीनेट का सभापति भी सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है और विधि निर्माण के कार्य को संसदीय व्यवस्थानुसार ठीक ढंग से संचालित करता है। सदन में शान्ति बनाये रखने का साथ सदन को अनुशासित भी रखता है।

नवीन संविधान के अनुसार यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद खाली हो जाता है। तो वह अस्थायी रूप में फ्रांस के राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा। सीनेट का सभापति राष्ट्रपति का प्रमुख परामर्शदाता होता है। राष्ट्रीय सभा के विघटन और संकटकालीन घोषणा के पूर्व वह राष्ट्रपति को परामर्श देता है। इस पद के साथ शक्ति और मर्यादा दोनों का समावेश है, इसलिए यह गौरवपूर्ण पद है।

विधायी प्रक्रिया (Legistative Procedure)

विधायी प्रक्रिया में सबसे पहले विधेयक के प्रस्तुतीकरण की स्थिति होती है। प्रधानमंत्री और संसद के सदस्यों को विधि-निर्माण में पहल करने का अधिकार है। सरकारी विधेयकों पर पहले मंत्रि-परिषद में विचार होता है और उन्हें संसद के किसी भी सदन के सचिवालय में जमा कर दिया जाता है, लेकिन वित्त विधेयकों को राष्ट्रीय सभा में ही आरम्भ किया जा सकता है। निजी सदस्यों के विधेयक नियमानुसार नहीं माने जाते, यदि उनके द्वारा आय में कमी और व्यय में वृद्धि हो। इसके अतिरिक्त यदि विधावी प्रक्रिया के दौरान ऐसा प्रतीत हो कि निजी सदस्य का विधेयक अथवा संशोधन कानून की सीमा) से बाहर है या सत्ता के विरुद्ध है तो सरकार घोषित कर सकती है और वह विधेयक पेश नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि इस प्रश्न पर सरकार और सम्बन्धित सदन के प्रधान के मध्य मतभेद हो तो इस प्रश्न को किसी भी पक्ष की प्रार्थना पर संवैधानिक परिषद के समक्ष प्रस्तुत किये जाने की व्यवस्था है जिस पर उसे 8 दिन के भीतर अपना निर्णय दे देना होता है।

विधेयक को पेश किये जाने के बाद उसे सदन की किसी भी एक नियमित अथवा स्थाई समिति के सुपुर्द कर दिया जाता है। सरकार या सदन की प्रार्थना पर विधेयक को किसी तदर्थ समिति के सुपुर्द भी किया जा सकता है।

कुछ महत्वपूर्ण समितियों की भी व्यवस्था है- सांस्कृतिक, पारिवारिक और सामाजिक म की समिति, वैदेशिक मामलों की समिति, राष्ट्रीय प्रतिरक्षा और सशस्त्र सेनाओं की समिति, वित्त और अर्थ व्यवस्था तथा आर्थिक नियोजन की समिति, संविधान विधि निर्माण और सामान्य प्रशासन की समिति, उत्पादन और व्यापार समिति सरकार विधेयक पर समिति की रिपोर्ट आ जाने पर सदन में विचार मंत्री द्वारा की जाने वाली घोषणा के बाद होता है। विधेयक का संचालन मंत्री स्वयं करता है। और वह उसमें संशोधन भी प्रस्तावित कर सकता है। सदन में पहले विधेयक के सामान्य सिद्धान्तों पर वाद-विवाद होता है। सदन विधेयक की एक-एक धारा पर मतदान करता है और अन्त में उसके संशोधित रूप में सम्पूर्ण विधेयक पर मतदान होता है। एक सदन में पास होने के बाद विधेयक दूसरे सदन में सीनेट से राष्ट्रीय सभा में वा राष्ट्रीय सभा से सीनेट में जाता है, जहाँ पर उस समान प्रक्रिया के अनुसार विचार होता है। दोनों सदनों द्वारा एक ही रूप में पारित किये जाने पर विधेयक को राष्ट्रपति लागू करता है और वह कानून का स्वरूप धारण कर लेता है।

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यदि सरकार अथवा संसदीय या निजी सदस्य के विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद हो, तो उसे दूर करने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई है। दोनों सदनों में मतभेद के परिणामस्वरूप जब कोई विधेयक प्रत्येक सदन में दो वाचन होने के बाद भी पास नहीं हो पाता अथवा यदि किसी विधेयक के विषय को सरकार प्रथम वाचन के बाद ही “अविलम्ब कार्यवाही वाला” अर्थात् है आवश्यक है (Urgent) घोषित कर देती है, तो प्रधानमंत्री को अधिकार है कि कुल दोनों सदनों के बराबर सदस्यों की एक संयुक्त समिति की बैठक आयोजित करे, जिसका कार्य वाद-विवाद होने वाले शेष मामलों पर नये रूप का प्रस्ताव रखना होता है। संयुक्त समिति द्वारा विधेयक का जो रूप तैयार किया जाता है उसे सरकार दोनों सदनों की स्वीकृति के लिए पुनः प्रस्तुत करती है। उसके बारे में सरकार द्वारा समिति सहमति पर आधारित रूप स्वीकार न कर सके तो सरकार उस पर राष्ट्रीय सभा सीनेट द्वारा एक नया वाचन होने के बाद राष्ट्रीय सभा को उस पर अन्तिम निर्णय करने के लिए कह सकती है। इस प्रकार विधि निर्माण के मामलों में राष्ट्रीय सभा ही अधिकार रखती है।

बजट के सम्बन्ध में यह व्यवस्था है कि उसके प्रारूप राष्ट्रीय सभा के सम्मुख अक्टूबर के प्रथम मंगलवार तक अवश्य पहुँच जाना चाहिए। उसके तुरन्त बाद उसे समिति को भेज दिया जाता है, लेकिन सदन में उस पर 15 दिन बाद ही वाद-विवाद शुरू हो सकता है। संसद के सदस्यों को बजट का अध्ययन करने के लिए दो सप्ताह का समय मिल जाता है। संविधान के अनुसार यह व्यवस्था है कि वित्त विधेयकों को आंगिक कानूनों के लिए विहित दशाओं के अन्तर्गत पेश किया जायेगा। यदि राष्ट्रीय सभा विधेयक के प्रस्तुत किये जाने के 40 दिन के भीतर उस पर प्रथम वाचन में निर्णय करने में असफल रहे, तो सरकार उसे सीनेट में प्रस्तुत करेगी और सीनेट को उस पर 15 दिन के भीतर निर्णय देना होगा। यदि विधेयक पर संसद 70 दिन के भीतर भी कोई निर्णय नहीं कर पाये तो विधेयक को अध्यादेश द्वारा लागू किया जा सकता है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि फ्रांस में एक सुव्यवस्थित विधायी प्रक्रिया है।

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