Sociology

शोध या अनुसंधान प्रारूप का अर्थ परिभाषा एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।

शोध या अनुसंधान प्रारूप का अर्थ परिभाषा एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।
Written by priyanshu singh

शोध या अनुसंधान प्रारूप का अर्थ – अनुसंधान अथवा शोध प्रारूप का तात्पर्य अध्ययन के उस प्रकार से होता है जिसे एक सामाजिक अनुसंधान कर्त्ता द्वारा किसी समस्या को भली-भाँति समझने के उद्देश्यवश सर्वाधिक उपयुक्त मानकर चुना जाता है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक अनुसंधानों में प्रारूप का तात्पर्य तथ्यों और आकड़ों का एकत्रीकरण तथा विश्लेषण इस प्रकार से करना है कि अनुसंधान की कार्य विधि इधर-उधर निरुद्देश्य न भटक पाये तथा इसके साथ-साथ व्यर्थ और अप्रासंगिक क्रियाओं में अनुसंधानकर्त्ता का समय तथा परिश्रम भी नष्ट न हों। इस प्रकार वैज्ञानिक क्रियाओं को नियन्त्रित रखकर अनुसंधान को अधिकाधिक वैज्ञानिक बनाये रखने की योजना है।

श्रीमती पी. वी. यंग के शब्दों में– “सामान्य वैज्ञानिक माडल को शोध क्रिया में बदलने के फलस्वरूप प्रारूप की रचना होती है।”

ई० ए० सचमन के अनुसार- “अनुसंधान का प्रारूप कोई ऐसी विशेष योजना नहीं है जिसमें बदलाव न हो अपितु महतो मार्ग दर्शन स्तम्भों के समान है।” आर० एल० एकॉफ- “प्रारूप निश्चयों को क्रियान्वित करने के पूर्व निर्णय लेने की प्रक्रिया है यह निर्णय की वह स्थिति है जिसमें आगामी संभावित स्थिति को नियन्त्रण में लाया जाता है।”

शोध अथवा अनुसंधान प्रारूप के प्रकार

सामाजिक अनुसंधानों का दायरा बदलने के साथ ही इसके प्रकार भी बढ़ रहे हैं परन्तु मुख्य प्रकार निम्वत् हैं-

  1. अन्वेषणात्मक प्रारूप
  2. वर्णात्मक प्रारूप
  3. प्रयोगात्मक प्रारूप
  4. निदानात्मक प्रारूप।

(1) अन्वेषणात्मक शोध

जब शोधकर्त्ता किसी सामाजिक घटना के पीछे छिपे कारणों को ढूंढ निकालना चाहता है ताकि किसी समस्या के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्ष के सम्बन्ध में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो सके तब अध्ययन के लिए जिस शोध का सहारा लिया जाता है उसे अन्वेषणात्मक या निरूपणात्मक शोध कहते हैं। इस प्रकार के शोध का उद्देश्य समस्या के सम्बन्ध में प्राथमिक जानकारी प्राप्त करके उपकल्पना का निर्माण और अध्ययन की रूपरेखा तैयार करना है। इस प्रकार के शोध द्वारा विषय का कार्यकारण सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। जिससे घटनाओं में व्याप्त नियमितता एवं श्रृंखलाबद्धता का पता लगाया जा सकता है। इस प्रकार की शोध की सफलता के लिए कुछ अनिवार्य दशाओं का होना आवश्यक है। जो निम्नलिखित हैं-

  • सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन
  • अनुभव सर्वेक्षण
  • सही सूचनादाताओं का चुनाव
  • उपयुक्त प्रश्न पूछना
  • (E) अन्तदृष्टिप्रेरक घटनाओं का विश्लेषण

(2) वर्णात्मक शोध

वर्णात्मक शोध समस्या के सम्बन्ध में वास्तविक तथ्यों को एकत्रित करके उनके आधार पर विवरण प्रस्तुत करता है। सामाजिक जीवन के सम्बन्धित कई पक्ष ऐसे होते हैं सम्बन्ध में भूतकाल में गहन अध्ययन नहीं किये गये हैं। ऐसे में उन सामाजिक जीवन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त की जाय परन्तु प्राप्त तथ्य वास्तविक और विश्वसनीय हो अन्यथा जो वर्णात्मक विवरण प्रस्तुत किया जायेगा वह वैज्ञानिक होने के बजाय दार्शनिक होगा। यदि हमें किसी जाति, समूह या समुदाय के जीवन के सम्बन्ध में कोई जानकारी प्राप्त करनी है तो आवश्यक है कि किसी वैज्ञानिक विधि का उपयोग करते हुए तथ्य प्राप्त किये जायें। इन प्रविधियों के प्रयोग का उद्देश्य यही है कि यथार्थ सूचनाएँ एकत्रित की जायें। शोध की सफलता के लिए निम्न बातें आवश्यक हैं-

  • शोध के उद्देश्यों का प्रतिपादन
  • तथ्य संकलन की प्रविधियों का चुनाव
  • निदर्शन का चुनाव
  • आकड़ों का संकलन एवं उनकी जाँच
  • तथ्यों का विश्लेषण
  • प्रतिवेदन प्रस्तुतीकरण।

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(3) परीक्षणात्मक शोध

परीक्षणात्मक शोध को प्रयोगात्मक शोध या व्याख्यात्मक शोध के नाम से भी जाना जाता है। जिस प्रकार भौतिक विज्ञानों में विषय को नियन्त्रित अवस्थाओं में रखकर उनका अध्ययन किया जाता है उसी प्रकार नियन्त्रित अवस्थाओं में अवलोकन परीक्षण के द्वारा सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करने को ही परीक्षणात्मक शोध कहते हैं। इस प्रकार के शोध में सामाजिक घटनाओं के कुछ चरों को नियन्त्रित कर दिया जाता है और शेष चरों पर नवीन परिस्थितियों के प्रभाव का पता लगाया जाता है। इस प्रकार के शोध से यह ज्ञात होता है कि किसी समूह, समाज, समुदाय, सामाजिक तथ्य, सामाजिक घटना आदि पर नवीन परिस्थितियों का कैसा और कितना प्रभाव पड़ा है। स्पष्ट है कि परीक्षणात्मक शोध का सामाजिक विज्ञान में वही महत्त्व है जो भौतिक विज्ञानों में प्रयोगशाला पद्धति का है। परीक्षणात्मक शोध तीन प्रकार के होते हैं-

  • पश्चात् परीक्षण
  • पूर्व पश्चात् परीक्षण
  • कार्यान्तर तथ्य परीक्षण।

(4) निदानात्मक शोध

जब कोई शोधकर्ता किसी समस्या के वास्तविक कारणों को जानने और उसका समाधान करने के उद्देश्यवश किसी शोध प्रारूप का निर्माण करता है तो ऐसे प्रारूप को निदानात्मक शोध प्रारूप कहा जाता है। यह शोध प्रारूप शोधकर्त्ता को किसी समस्या का समाधान मनमाने रूप से नहीं करने देता है अपितु यह उन पद्धतियों को महत्त्व देता है। जिनके माध्यम से तथ्यों को तटस्थता पूर्वक संकलन करके उस व्यवस्था के लिए उत्तरदायी वास्तविक कारकों को ज्ञात किया जा सके। इस प्रारूप के अन्तर्गत शोधकर्ता समस्या के समाधान हेतु केवल सुझाव ही प्रस्तुत करता है। समस्याओं के समाधान का यह कार्य सामाजिक कार्यकर्त्ताओं, प्रशासकों के द्वारा किया जाता है। उदाहरणार्थ- यदि कोई शोधकर्त्ता अपराध के कारणों को ज्ञात करने एवं एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने के उद्देश्यवश अध्ययन की योजना तैयार करे तो इस योजना को हम निदानात्मक शोध प्रारूप कहेंगें।

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