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स्पेन्सर के सामाजिक सावयव सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।

स्पेन्सर के सामाजिक सावयव सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
Written by priyanshu singh

स्पेन्सर के सामाजिक सावयव सिद्धान्त – स्पेन्सर ने अपनी सामाजिक सावयय की धारणा की चर्चा सर्वप्रथम अपनी पुस्तक ‘सामाजिक स्थिति विज्ञान’ (Social Statics 1851) में की थी। इसका तर्क पूर्ण और विस्तृत वर्णन उसने अपने प्रसिद्ध निवन्ध सामाजिक मावयव (Social Organism 1860) में किया है। स्पेन्सर के अन्य समाज शास्त्र के सिद्धान्त 1873 में इस सिद्धान्त की पुनरावृत्ति हुई। उसकी अन्तिम रचना ‘तथ्य एवं आलोचनाएँ 1902 में इसका उल्लेख है।

स्पेन्सर के सावयव सिद्धान्त का स्वरूप स्पेन्सर ने समाज की कल्पना एक जीवधारी के रूप में की है और राज्य के साथी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उसने समाज एवं राज्य दोनों को सजीव प्राणी बताया है और दोनों को सावयवी स्वरूप प्रदान किया है। उसने यहाँ तक कह डाला है कि समाज शरीर के समान नहीं, बल्कि स्वयं शरीर है।” यह सिद्धान्त व्यक्ति एवं राज्य में समानता स्थापित करता है। इसकी मान्यता है कि जिस प्रकार व्यक्ति के शरीर में विभिन्न अंग होते हैं, उसी प्रकार राज्य में आर्थिक, सैनिक, शासक वर्ग आदि होते हैं। जिस प्रकार व्यक्ति के शरीर के विभिन्न अंग परस्पर सहयोग और निर्भरता से काम करते हैं ठीक उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अंग (विभिन्न वर्ग) परस्पर सहयोग और निर्भरता से काम करते हैं। स्पेन्सर का कहना है कि मानव शरीर के समान ही राज्य की किशोर, युवा और वृद्ध अवस्थाएँ होती है एवं राज्य की भी मृत्यु होती है।

स्पेन्सर के सावयव सिद्धान्त का सारांश यह है कि समाज स्वभावतः एक जीवनधारी शरीर है। अतः जो नियम प्राकृतिक शरीर तथा उसके कार्यों के साथ लागू होते हैं वही साधारणतया सामाजिक शरीर तथा उसके कार्यों के साथ भी लागू होने चाहिए। स्पेन्सर ने समाज को जीवित प्राणी माना है और प्राणी एवं समाज में निम्नलिखित समानताओं की कल्पना की है-

  • प्राणी शरीर और समाज शरीर दोनों ही आरम्भ में एक फीटाणु के रूप में होते हैं और धीरे-धीरे इनका विकास होता है। विकास के साथ-साथ इनके स्वरूप में विविधता और जटिलता बढ़ती जाती है।
  • शरीर में जैसे पोषण एवं अन्य पाचन क्रिया होती है, वैसे ही समाज में उत्पादन होता है।
  • जिस प्रकार शरीर में कोष्ठ तथा रक्ताणु धीरे-धीरे निरन्तर बदलते, नष्ट होते और बनते रहते हैं उसी प्रकार राज्य में भी प्रक्रिया होती रहती है, मनुष्य मरते हैं, जन्म लेते हैं और राज्य का संगठन कायम रहता है।

प्राणी समाज (राज्य) में असमानताएँ

स्पेन्सर ने स्वयं स्वीकार किया है कि मनुष्य शरीर और समाज शरीर में उपर्युक्त समानताओं के साथ-साथ मित्रताएँ भी हैं जैसे-

  1. प्राकृतिक शरीर का स्वरूप सदा निश्चित होता है, किन्तु समाज का स्वरूप निश्चित
  2. प्राकृतिक शरीर के अंग परस्पर जुड़े होते हैं और अपने निर्धारित स्थान से हटाये नहीं होता। नहीं जा सकते, किन्तु सामाजिक शरीर के अंग अर्थात् व्यक्ति, परस्पर जुड़े नहीं होते और अपने स्थान से इन्हें हटाया जा सकता है।
  3. प्राकृतिक शरीर के अंग यंत्रवत होते हैं, शरीर से अलग इनका अपना जीवन नहीं होता, किन्तु सामाजिक शरीर के अंग बिखरे हुए होते है और उनका स्वतंत्र अस्तित्त्व होता है।

सावयव सिद्धान्त के दोष-

  1. समाज (राज्य) को जीवधारी मानना एक अर्यहीन, आधारहीन और त्रुटिपूर्ण विचार है। राज्य मानसिक संगठन है भौतिक नहीं बार्कर ने भी कहा है कि “राज्य जीवधारी नहीं है, किन्तु जीवधारी के समान है।”
  2. प्राणी शरीर का निर्माण करने वाले अंग एक-दूसरे से भौतिक दृष्टि से सम्बद्ध होते हैं, किन्तु इस प्रकार का सम्बन्ध समाज निर्माण करने वाले व्यक्तियों में नहीं होता।
  3. समाज (राज्य) व जीवधारी की रचना में मौलिक एवं महत्त्वपूर्ण अन्तर है। शरीर के कोष्ठ यांत्रिक टुकड़े मात्र हैं। उनका स्वतन्त्र जीवन नहीं है, वे विचार और इच्छा से दूरदर्शी, विचारवान और तर्कजीवी होते हैं।

क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति) के संगठन, कार्यों एवं शक्तियों का उल्लेख कीजिए।

सावयव सिद्धान्त का महत्त्व

इस सिद्धान्त ने यह बताया है कि राज्य सतत्प्र यत्नों का फल है, एक दिन के चमत्कार का परिणम नहीं आज व्यक्ति को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता। राज्य से अलग व्यक्ति के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। गेटिस ने इस सिद्धान्त के निम्नलिखित गुणों पर प्रकाश डाला है-

  1. यह सिद्धान्त ऐतिहासिक और विकासवादी दृष्टिकोणों का महत्त्व बताता है।
  2. यह प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण के प्रभावों पर जोर देता है।
  3. यह सामाजिक जीवन की मौलिक एकता और समाज के विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों पर जोर देता है।
  4. यह नागरिक और राजनीतिक संस्थाओं की पारस्परिक निर्भरता पर जोर देता है।
  5. यह सिद्धान्त हमें सिखाता है कि समाज व्यक्तियों के एक ऐसे संगठन से कहीं अधिक है जिनमें एकता का बन्धन नहीं है और वे इधर-उधर बिखरे हुए हैं।
  6. यह सिद्धान्त इस विश्वास पर आधारित है कि मनुष्य स्वभाव से ही राजनीतिक प्राणी है और राज्य उनके सामाजिक संगठन का सार्वभौम प्रवृत्ति का फल है।

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