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मार्क्स के द्वन्द्वात्मकभौतिकवाद से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख विशेषतायें लिखिए।

मार्क्स के इन्द्वात्मक भौतिकवाद से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख विशेषतायें लिखिए।
Written by priyanshu singh

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद – द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मार्क्स के विचारों का मूल आधार है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में उत्तर- दो शब्द हैं, इनमें प्रथम शब्द तो उस प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, जिसके अनुसार सृष्टि का विकास हो रहा है और दूसरा शब्द सृष्टि के मूल तत्त्व को सूचित करता है।

द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया

मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक प्रणाली को हीगल से ग्रहण किया है। हीगल के अनुसार समाज की प्रगति प्रत्यक्ष तरीके से न होकर एक टेढ़े-मेढ़े तरीके से हुई है। इसके तीन अंग हैं। बाद, प्रतिवाद, व समवाद मार्क्स की द्वन्द्वात्मक पद्धति का आधार हीगल का यही द्वन्द्वात्मक दर्शन है। मार्क्स के अनुसार वह समाज की एक साधारण स्थिति है, जिसमें कोई अन्तर्विरोध नहीं पाया जाता है। थोड़े समय बाद बाद से असंतुष्ट होकर उसकी प्रतिक्रिया के स्वरूप में प्रतिवाद उत्पन्न हो जाता है। यह निषेधात्मक स्थिति वाद की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील मानी जाती है। प्रतिवाद में अन्तर्विरोध चलता है तथा प्रतिवाद का भी प्रतिवाद उत्पन्न होता है और दो प्रतिवाद के संयोग से समवाद की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार वाद, प्रतिवाद और समवाद की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।

आर्थिक जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के संदर्भ में इस द्वन्द्वात्मक पद्धति को इस प्रकार समझाया जा सकता है। पूंजीवाद या व्यक्तिगत सम्पत्ति की अवस्था वाद है, जिसमें यह असंगति रहती है कि समाज शक्तिशाली व सर्वहारा लोगों के दो वर्गों में बंट जाता है। इस असंगति के कारण समाज में संघर्ष होता है तथा व्यक्तिगत सम्पत्ति की सामाजिक व्यवस्था के प्रतिवाद स्वरूप समाज के विकास की वह व्यवस्था आती है, जिसे सर्वहारा वर्ग के अधिनायक-तन्त्र की अवस्था कहा जाता है। इन दोनों अवस्थाओं के समवाद स्वरूप वह अवस्था आती है, जिसे साम्यवाद की अवस्था कहा जाता है। इसमें व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्थान पर सार्वजनिक स्वामित्व की अवस्था होती है।

मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक प्रणाली हीगल से ग्रहण की है परन्तु मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद हीगल के द्वन्द्ववाद से बहुत अधिक भिन्न है वरन् वह उसके बिल्कुल विपरीत है। मैंने हीगल का द्वन्द्वात्मक तर्क अपने सिर के बल खड़ा पाया, मैंने उसे सीधा कर पैरों के बल पर खड़ा कर दिया।

हीगेल और मार्क्स के इन्द्रवाद में प्रमुख अन्तर यह है कि हीगल एक आदर्शवादी या और वह विश्वात्मा या सूक्ष्मतम आत्मतत्त्व को समाज का नियामक कारण मानता था। हीगल की दृष्टि में इतिहास विश्वात्मा की क्रमिक अभिव्यक्ति है और वह भी एक देवी आयोजन द्वारा जो सम्पूर्ण विश्व में परिव्याप्त है। परन्तु मार्क्स ने हीगत के विश्वात्मा सिद्धान्त को काल्पनिक कहकर छोड़ दिया और उसके स्थान पर विशुद्ध भौतिक तत्त्व की महत्ता स्वीकार की, क्योंकि वह न केवल प्रत्यक्ष ज्ञान या वास्तविक सत्य है, वरन् सुस्पष्ट शाश्वत रूप भी है। मार्क्स का कहना है कि हम आत्मा का अनुभव स्पष्ट रूप में नहीं कर सकते और इसलिये हमारे लिये उसका होना नहीं के बराबर है। परन्तु इसके विपरीत भौतिक पदार्थ जैसे- मिट्टी, पत्थर, हड्डी, मांस आदि प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं और हमारे लिये ये सर्वथा सत्य हैं। इस प्रकार मार्क्स ने हीगल के विपरीत भौतिकवाद को अपने दर्शन का आधार बनाया।

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विशेषता-

(1) इन्द्रवाद के अनुसार विश्व असम्बद्ध वस्तुओं का ढेर या संग्रह मात्र नहीं है, वरन् समग्र इकाई है, जिसकी समस्त वस्तुएँ सम्बद्ध व परस्पर निर्भर हैं। इसलिए हमारे द्वारा किसी वस्तु को दूसरी वस्तुओं के साथ उसके सम्बन्धों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।

(2) इन्द्रवार के अनुसार प्रकृति अस्थिर, गतिशील और निरंतर परिवर्तन है। प्रकृति के अन्दर सदैव कुछ नयी चीजें उत्पन्न और विकसित होती तथा पुरानी चीजें नष्ट होती रहती हैं। अतः हमारे द्वारा विश्व व उसकी प्रकृति को समझने के लिए उसकी गतिशीलता को दृष्टि में रखना होगा।

(3) इन्द्रवाद के अनुसार वस्तुओं में विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया सरल नहीं है। वे केवल अपनी दिशा में आगे नहीं बढ़ती वरन् उनमें गुणात्मक परिवर्तन भी होता है। इसके परिणामस्वरूप ये अपने पुराने गुण छोड़कर नवीन गुण धारण कर लेती हैं।

(4) वस्तुओं में गुणात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे न होकर शीघ्रता के साथ तथा अचानक होते हैं।

(5) वस्तुओं में गुणात्मक परिवर्तन क्यों होते हैं, इसका उत्तर मार्क्स हीगल की विचारधारा के अनुसार होता है। उसके अनुसार वस्तुओं में शाश्वत अन्तर्विरोध पाया जाता है, और वस्तुओं में निहित इन परस्पर विरोधी तत्त्वों के संघर्ष के फलस्वरूप ही वस्तु में गुणात्मक परिवर्तन होता है।

(6) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्राकृतिक जगत की आर्थिक तत्त्वों के आधार पर व्याख्या करता है और पदार्थ को समस्त विश्व की नियंत्रक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है।

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